नज़र से तुम को मिले न कोई सुराग़ दिल काझुका के गर्दन बुझा लिया है चराग़ दिल कासुनूँ न कैसे करूँ न क्यूँकर मैं अपने दिल कीमेरे अलावा है कौन इस बद-दिमाग़ दिल का— Ammar Iqbal