मर्तबा था मकाम था मेरा
रौशनी पर कयाम था मेरा
मैं ही भेजा गया था पहले भी
तब कोई और नाम था मेरा
आख़िरी वक़्त आँख खुल गई थी
वरना क़िस्सा तमाम था मेरा
— Ammar Iqbal
रौशनी पर कयाम था मेरा
मैं ही भेजा गया था पहले भी
तब कोई और नाम था मेरा
आख़िरी वक़्त आँख खुल गई थी
वरना क़िस्सा तमाम था मेरा
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