कुछ बचाने के लिए उम्र गँवाते हुए लोग

ख़र्च हो जाएँगे ये ख़्वाब कमाते हुए लोग

भूल जाते हैं कि अब याद नहीं रखना मुझे
मेरा क़िस्सा मुझे आ आ के सुनाते हुए लोग

इक तवक़्क़ो' का बहर-हाल भरम रखते हैं
रूठने वालों को हर बार मनाते हुए लोग

छोड़ जाएँगे किसी दिन ये बताते ही नहीं
ये बताते ही नहीं अपना बनाते हुए लोग

तेरी दहलीज़ पे कुछ फूल नहीं ख़ुद को भी
छोड़ आते हैं तेरे शहर से जाते हुए लोग

हर तअल्लुक़ में यही ख़ौफ़ कि बस अब के गया
हम फ़सीलों की दराड़ों को छुपाते हुए लोग

सो नहीं पाएँगे कमरे में अँधेरा कर के
जागती आँख में मंज़र को सुलाते हुए लोग

ख़ुश-लिबासी भी है पर्दा किसी महरूमी का
जिस्म से रूह के आज़ार छुपाते हुए लोग

— Anfal Rafique

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