नहीं ये आँसू बिल्कुल ग़ैर-शु'ऊरी है
ख़्वाब सलामत हैं और नींद भी पूरी है
सब कुछ पहले जैसा लगने लगता है
हम में जैसे इक मैसेज की दूरी है
इक महरूमी है कुछ देख न पाना भी
इक शय देखते रहना भी मा'ज़ूरी है
देर में पिछले हिज्र से बाहर निकले हो
एक मोहब्बत तो फ़िल-फ़ौर ज़रूरी है
फ़ासला ही बेहतर है पहले बतला दूँ
फिर नहीं कहना ये कैसी मग़रूरी है
उस का 'अह्द निभाना सहल नहीं 'अंफ़ाल'
ख़ैर कोई नईं मेरी तो मजबूरी है
As you were reading Shayari by Anfal Rafique
our suggestion based on Anfal Rafique
As you were reading undefined Shayari