किसी की आँख से देखा हुआ मंज़र बनाते हैं
अगरचे इस तरह बनता नहीं है पर बनाते हैं
कभी होगी नहीं होगी अगर होगी तो कब होगी
वो इक दस्तक कि जिस के वास्ते हम दर बनाते हैं
समुंदर की तरफ़ जिस में खुली रहती हो इक खिड़की
हम ऐसे लोग ख़्वाबों में ही ऐसा घर बनाते हैं
कभी इस दिल को आईना बनाया था तेरे होते
सो तेरे लौट आने तक इसे पत्थर बनाते हैं
अगर आँखें बनाना हों तो पहले दिल ज़रूरी है
अगर पाँव बनाना हों तो पहले सर बनाते हैं
न-जाने किस तरफ़ से अब वो दस्तक देने आ जाए
हर इक जानिब से दीवारें गिरा कर दर बनाते हैं
उसी के गिर्द रक्खा है मदार अपने ख़यालों का
वही तो है जिसे हम ज़ात का मेहवर बनाते हैं
हमें बनने सँवरने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती
तेरी आँखों के आईने हमें सुंदर बनाते हैं
इसी डर से किसी भी नक़्श पर मेहनत नहीं करते
कि बिल-आख़िर बिगड़ जाता है जो बेहतर बनाते हैं
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