तमाम मुद्दत तू जिसकी ख़ातिर ख़ुदा रहा है
वो अब मेरे दर पे आ के सिर को झुका रहा है
दिखा रहा था मैं जिसको मंज़िल की कब से राहें
वो बढ़ के आगे मेरे ही रस्ते में आ रहा है
ख़ुदा को मानो न मानो वो सब तुम्हारी मर्ज़ी
मगर कोई है, यहाँ जो सब कुछ चला रहा है
मैं अब यहाँ पे दोबारा आने से डर रहा हूँ
और एक तू है जो इसको दुनिया बता रहा है
निगाह बख़्शी है जिसको मैंने, दिखाई दुनिया
वो आज देखो मुझी को आँखें दिखा रहा है
तुम्हें बना के बची जो मिट्टी ख़ुदा उसी से
हसीन लोगों के सारे ज़ेवर बना रहा है
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