इस सेे पहले कोई आ कर के बचा ले मुझ को
हिज्र उस का ही कहीं मार न डाले मुझ को
अब तो साहिल पे पहुँच कर ही मैं कुछ दम लूँगा
इस से पहले ये समुंदर जो उछाले मुझ को
जिस तरह शहद को मक्खी ने छुपाया अक्सर
इस तरह माँ तू भी आँचल में छुपा ले मुझ को
ये ग़रज़ मेरी थी मंज़िल पे रुका हूँ आ कर
दर्द देते ही रहे पाँव के छाले मुझ को
चाँद से जब भी मिरी बात बिगड़ जाएगी
मिल के जुगनू ही सभी देंगे उजाले मुझ को
इस लिए भी इसे जागीर समझता हूँ मैं
मर के होना ही है मिट्टी के हवाले मुझ को
— Ansar Eatvi















