क्यूँँ किसी और को दुख दर्द सुनाऊँ अपने
अपनी आँखों से भी मैं ज़ख़्म छुपाऊँ अपने
मैं तो क़ाएम हूँ तिरे ग़म की बदौलत वरना
यूँ बिखर जाऊँ कि ख़ुद हाथ न आऊँ अपने
शे'र लोगों के बहुत याद हैं औरों के लिए
तू मिले तो मैं तुझे शे'र सुनाऊँ अपने
तेरे रस्ते का जो काँटा भी मुयस्सर आए
मैं उसे शौक़ से कॉलर पर सजाऊँ अपने
सोचता हूँ कि बुझा दूँ मैं ये कमरे का दिया
अपने साए को भी क्यूँ साथ जगाऊँ अपने
उस की तलवार ने वो चाल चली है अब के
पाँव कटते हैं अगर हाथ बचाऊँ अपने
आख़िरी बात मुझे याद है उस की 'अनवर'
जाने वाले को गले से न लगाऊँ अपने
— Anwar Masood















