'ishq ka rog hua jaa.e to lahaul padho | 'इश्क़ का रोग हुआ जाए तो लाहौल पढ़ो

  - A R Sahil "Aleeg"

'इश्क़ का रोग हुआ जाए तो लाहौल पढ़ो
बेवफ़ा सामने आ जाए तो लाहौल पढ़ो
'इश्क़ के ऐन से और हुस्न के हे से न मिलो
हादिसा कोई मिला जाए तो लाहौल पढ़ो

बेवफ़ा हो तो नहीं माँगो कभी 'इश्क़ की भीख
छोड़ कर जब वो चला जाए तो लाहौल पढ़ो
'इश्क़ इक मर्सिया है फिर भी कोई नाम-ए-इश्क़
जब क़सीदा वो सुना जाए तो लाहौल पढ़ो

उसको अश्कों की रवानी से निकालो बाहर
कोई आँखों में समा जाए तो लाहौल पढ़ो

वैसे तो होने न दो 'इश्क़ को हावी सर पर
हाँ अगर फिर भी ये छा जाए तो लाहौल पढ़ो

सौ क़दम दूर रहो 'इश्क़ की नगरी से मियाँ
पास माशूक़ जो आ जाए तो लाहौल पढ़ो

कर तो सकते नहीं अब इस से ज़ियादा कुछ भी
दीप आँधी को बुझा जाए तो लाहौल पढ़ो

दर्द तो दर्द है हर दर्द पे रोना कैसा
जब भी सीने में समा जाए तो लाहौल पढ़ो

जिस को हर साँस पे हर वक़्त पुकारा तुमने
तुम को वो शख़्स भुला जाए तो लाहौल पढ़ो

जाने वाला जो चला आए तो बख़्शो इज़्ज़त
आने वाला जो चला जाए तो लाहौल पढ़ो

पूस की रात है और उस पे पुराना कंबल
बारिश इस पर भी जो आ जाए तो लाहौल पढ़ो

आज फिर 'इश्क़ मेरा याद मुझे आया है
चैन साहिल को जो आ जाए तो लाहौल पढ़ो

  - A R Sahil "Aleeg"

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