na jaane kyun tumhaari yaad aayi besabab be-wajh | न जाने क्यूँ तुम्हारी याद आई बेसबब बे-वज्ह

  - A R Sahil "Aleeg"

न जाने क्यूँ तुम्हारी याद आई बेसबब बे-वज्ह
उदासी ज़ेहन-ओ-दिल पर मेरे छाई बे-सबब बे-वज्ह

वफ़ा तुझसे हर इक लम्हे निभाई बेसबब बे-वज्ह
हमीं ने आग इस दिल को लगाई बे-सबब बे-वज्ह

हमारी चूक है या फिर तुम्हें भाया है कोई और
नहीं होती कभी भी बेवफ़ाई बे-सबब बे-वज्ह

हमें जिसको सजाना था दुआओं से अक़ीदों से
वो दुनिया 'इश्क़ में अपनी लुटाई बे-सबब बे-वज्ह

जो अब चुभते हैं काँटें तो किसी से मत करो शिकवे
कहो ख़ुद फ़स्ल ऐसी क्यूँ उगाई बे-सबब बे-वज्ह

महज़ हफ़्ते न चल पाया तुम्हारा 'इश्क़ जान-ए-मन
क़सम क्यूँ 'उम्र भर की जान खाई बे-सबब बे-वज्ह

नहीं आते हैं जाने वाले जब ये थी ख़बर 'साहिल'
बताओ 'उम्र सारी क्यूँ बिताई बे-सबब बे-वज्ह

  - A R Sahil "Aleeg"

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