ज़रा भी ख़ौफ़ मुझे अब न आन बान का है
ये देखना है वो पाबंद क्या ज़बान का है
मिटा रहा है अँधेरे गली के कम है क्या
भले चराग़ किसी दूसरे मकान का है
जो दरमियाँ है हमारे हमारा है ही नहीं
ये फ़ासिला तो ज़मीं और आसमान का है
ज़रा सी दूर उड़ा था मैं अपने पर खोले
हवा में शोर अभी तक मिरी उड़ान का है
बिखर गया है ज़मीं पर महकता है फिर भी
ये फूल जाने भला किस के फूलदान का है
भले अलग हैं तरीक़े मियाँ इबादत के
है आरती का वही वक़्त जो अज़ान का है
हमारा तीर नहीं जाता है हदफ़ के पार
हदफ़ के पार निशाँ और ही कमान का है
मैं अपने हक़ में सफ़ाई तमाम दे बैठा
अब इंतिज़ार मुझे आप के बयान का है
झलक ही जाती है लहज़े से परवरिश उस की
ज़बाँ बताती है वो कैसे ख़ानदान का है
डुबो न पाएगा दरिया कोई भी हम को ख़ुदा
हमारे पास में 'साहिल' तेरी अमान का है
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