अब दामन-ए-उमीद भी छोड़ा हुआ सा है
दिल से तिरा ख़याल भुलाया हुआ सा है
है तर्क-ए-आरज़ू की तमन्ना भी आरज़ू
सुलझा हुआ ख़याल भी उलझा हुआ सा है
अब तक रही है जिसके सहारे पे ज़िन्दगी
वो आसरा भी आज तो टूटा हुआ सा है
क्या आज तेरे लुत्फ़-ओ-करम याद आ गए
दिल हर ग़म-ए-हयात को भूला हुआ सा है
ऐ हुस्न क्यूँँ उदास है तुझ सेे गिला नहीं
'इश्क़ आज अपने आप से रूठा हुआ सा है
रूदाद-ए-इंक़लाब-ए-चमन आज क्या कहें
देखो 'बशर' ये रंग ही बदला हुआ सा है
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