शायद कि तसव्वुर में है दिलदार का साया
हर सू नज़र आता है मुझे प्यार का साया
औरों पे रखा जिसने सदा प्यार का साया
आज उसकी ही गर्दन पे है तलवार का साया
हल्की सी इक उम्मीद रही दिल में कि जैसे
चिलमन से झलकता हुआ रुख़्सार का साया
आशिक़ है जो कमज़ोर तो हल्का हो कफ़न भी
काफ़ी है फ़क़त दामन-ए-दिलदार का साया
सुर्ख़ी की तलब ज़ेहन पे हो जाती है हावी
किरदार बदल देता है अख़बार का साया
ऐसा तो हुआ क्या ये मेरे चारागरों को
डरते हैं कि पड़ जाए न बीमार का साया
कातिल से 'बशर' जीने की मोहलत तो मिली है
हर वक़्त मगर सर पे है तलवार का साया
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