kabhi maqaam ka koii pata nahin hota | कभी मक़ाम का कोई पता नहीं होता

  - Dharmesh bashar

कभी मक़ाम का कोई पता नहीं होता
कभी पता भी हो तो रास्ता नहीं होता

अगर मैं तेज़ हवा से लड़ा नहीं होता
चराग़ कोई सलामत बचा नहीं होता

हमारे क़त्ल के हैं कितने दस्तयाब सबूत
हमारे हक़ में मगर फ़ैसला नहीं होता

बदल दिया है नए दौर ने बहुत इसको
पुराना आदमी फिर भी नया नहीं होता

ज़रा सी बात पे तुमने तो फेर लीं नज़रें
ज़रा सी बात पे कोई ख़फ़ा नहीं होता

ये राज़ मुझ पे बहुत बाद में खुला जा कर
सफ़र में साथ कोई क़ाफ़िला नहीं होता

ये तो हर एक का अपना नज़रिया है वर्ना
ग़ज़ल का कोई नया ज़ाविया नहीं होता

सभी को आता है कोई न कोई काम 'बशर'
हर एक शख़्स मगर काम का नहीं होता

  - Dharmesh bashar

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