तासीर-ए-इश्क़ क्या है उन्हें कुछ ख़बर नहीं
ये भी है क्या असर जो इधर है उधर नहीं
ख़ाली मुसाफ़िरों से मिरी रहगुज़र नहीं
पर ये भी सच है कोई शरीक-ए-सफ़र नहीं
पास-ए-अदब ने दस्त-ए-तलब रोक ही लिया
दिल में भले ही हाँ है लबों पर मगर नहीं
दिल छोड़ जाएँ गर तो कहाँ जाएँ रंज-ओ-ग़म
ये उनकी मिल्कियत है किराए का घर नहीं
दाग़-ए-लहू जहाँ न मिले ऐ मुसाफ़िरों
छाले गवाह है वो मिरी रहगुज़र नहीं
गिर पाए हम न दौर की निचली हदों तलक
लाखों हुनर हैं हम में मगर ये हुनर नहीं
क़ासिद ने जो कहा तो लगा है वो आएँगे
पर कहता तजरबा कि ख़बर मोतबर नहीं
जिस
में 'बशर' न याद-ए-सनम हो न दर्द हो
वो दिल भी दिल नहीं वो जिगर भी जिगर नहीं
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