देखते ही देखते नायाब हो जाऊँगा मैं
एक दिन तेरे लिए भी ख़्वाब हो जाऊँगा मैं
कुछ तो पहले ही से नम है मेरी मिट्टी का मिज़ाज
और कुछ अश्कों से भी सैराब हो जाऊँगा मैं
ख़ुश्क होती जा रही है मेरे अंदर की नदी
है यही आलम तो अब महताब हो जाऊँगा मैं
ज़िंदगी को अपनी मंज़िल पर पहुँच जाने तो दो
बे-नियाज़-ए-मिम्बर-ओ-मेहराब हो जाऊँगा मैं
अब अगर छेड़ा किसी ने साहिलों का तज़्किरा
अपनी कश्ती के लिए गिर्दाब हो जाऊँगा मैं
डूबते सूरज का मंज़र है नज़र के सामने
ऐसा लगता है 'बशर' ग़र्क़ाब हो जाऊँगा मैं
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