सुनते हैं कि वो शोख़ अभी निकला है घर से
हर राह से कह दो कि गुज़र जाए इधर से
पहले सा तबस्सुम है न पहले सा तकल्लुम
कुछ हो न गया हो मिरी गुस्ताख़ नज़र से
ऐ ख़्वाब-ए-परेशान तुझे रब ही सुलाए
दिल काँप उठा है तिरी ताबीर के डर से
यारान-ए-दुआ-गो को ये मालूम नहीं है
क्या हाल हुआ मेरा दुआओं के असर से
आँधी से ज़रा पूछिए क्या उसने भी देखी
जो शाख़ बिलखती हुई टूटी थी शजर से
आँसू तो फिर आँसू है कोई पोंछ ही देगा
उस ख़ून का क्या होगा जो टपका है जिगर से
वीराने में दो बूँदों से क्या बात बनेगी
बादल से कहो बरसे तो फिर टूट के बरसे
ऐसा न हो इक दोस्त भी दुश्मन में बदल जाए
मैं वस्ल से घबराता हूँ तन्हाई के डर से
ये जाम-ओ-सुबू उन को ही दो जिनके लिए हैं
गर कोई बला-नोश तरसता है तो तरसे
कैसा ये क़फ़स मैंने बनाया है बदन का
आईना मुक़ाबिल है 'बशर' आठ-पहरस
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