jo la-faani rahe aisi hararat shams kii dekhi | जो ला-फ़ानी रहे ऐसी हरारत शम्स की देखी

  - Dharmesh bashar

जो ला-फ़ानी रहे ऐसी हरारत शम्स की देखी
जले औरों की ख़ातिर यह शराफ़त शम्स की देखी

फ़लक पर अब्र का इक सुरमई सा जाल बुनने को
उड़ा कर ले गया पानी शरारत शम्स की देखी

घटा देता है अक्सर वस्ल की रातों की मुद्दत को
'अजब अहल-ए-मुहब्बत से रक़ाबत शम्स की देखी

न जाने चाँद सूरज में हुईं गुस्ताख़ियाँ कैसी
चुराता आज तक नज़रें नदामत शम्स की देखी

'बशर' ख़ुद को जला कर बख़्शता है रौशनी सब को
करें सज्दा सभी जिसको वो अज़मत शम्स की देखी

  - Dharmesh bashar

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