वो मेरी आबला-पाई पे तंज करता रहा
मैं आसमानों की वुस'अत से भी गुज़रता रहा
फ़राज़-ए-दार पे चढ़ता रहा उतरता रहा
मिरा वजूद सिमटता रहा बिखरता रहा
मैं आइने की तरह देखता रहा उसको
वो मेरे सामने हँसता रहा सँवरता रहा
अँधेरी रात समंदर में ग़र्क़ होती रही
मैं अपने हाथ में सूरज लिए उभरता रहा
उसी को आज मिरे ख़ून की ज़रूरत है
जो 'उम्र भर मिरे ख़ाकों में रंग भरता रहा
मैं एक ज़र्रा-ए-बेनूर था 'बशर' लेकिन
तिलिस्म-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से जिहाद करता रहा
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