मैं चारा-गर से पक रहा हूँ मेरी नब्ज़ देख
ऐ वैद मैं सनक रहा हूँ मेरी नब्ज़ देख
मैं एक उम्र से हूँ इसी शहर का मकीं
पर रास्ते भटक रहा हूँ मेरी नब्ज़ देख
मैं उस को छूके पहले के जैसा नहीं रहा
दिल की तरह धड़क रहा हूँ मेरी नब्ज़ देख
क्या अब मैं वो नहीं हूँ जो उस को पसंद था
अब मैं उसे खटक रहा हूँ मेरी नब्ज़ देख
सब उल्टा हो रहा है जो भी कर रहा हूँ मैं
आराम कर के थक रहा हूँ मेरी नब्ज़ देख
— Bhuwan Singh















