kaise kahooñ ki ek bala sii hai zindagi | कैसे कहूँ कि एक बला सी है ज़िंदगी

  - Bhuwan Singh

कैसे कहूँ कि एक बला सी है ज़िंदगी
कैसे कहूँ कि ख़ून की प्यासी है ज़िंदगी

ये झूठ है कि ज़िंदगी में है ज़रा सा ग़म
सच तो ये है कि ग़म में ज़रा सी है ज़िंदगी

तुम सेे भी पहले उसने मुझे मुॅंह लगाया था
तुम सेे भी ज़्यादा तो मेरी बासी है ज़िंदगी

मुझ पर वो राज करती है जैसे ग़ुलाम हूँ
यानी उस एक शख़्स की दासी है ज़िंदगी

मिलती नहीं सज़ाऍं कभी बेवफ़ाओं को
संगीन मामलों में सियासी है ज़िंदगी

  - Bhuwan Singh

More by Bhuwan Singh

As you were reading Shayari by Bhuwan Singh

Similar Writers

our suggestion based on Bhuwan Singh

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari