कुछ ऐसे रास्तों से आना जाना पड़ता है
हमें भी हिज्र में हर दिन बिताना पड़ता है
हम एक दूसरे के साथ चार साल रहे
हम एक रिश्ते में थे ये बताना पड़ता है
हम उस की ग़लती पे तो रूठ जाते हैं उस से
हमें ही बा'द में उस को मनाना पड़ता है
वो चूम आती है हर रोज़ इक नया चेहरा
ये जानकर भी उसे मुँह लगाना पड़ता है
सुनाई क्यूँ नहीं देता तुम्हें तुम्हारा नाम
तुम्हें भी बे-वफ़ा कह के बुलाना पड़ता है
— Bhuwan Singh















