haath men kabhi chura kabhi gulaab rakhta hai | हाथ में कभी छुरा कभी गुलाब रखता है

  - Bhuwan Singh

हाथ में कभी छुरा कभी गुलाब रखता है
एक शख़्स मेरी मौत ला-जवाब रखता है

रस है मीठा मीठा सा नशा भी बेहतरीन है
लब पे शहद है पर आँखों में शराब रखता है

वैसे उसको खेलना पसंद है उजालों से
सो चराग़ फेंककर वो आफ़ताब रखता है

लोग उस सेे मिलते है तो चेहरा देख पाते हैं
क्या करें हमारे वक़्त वो हिजाब रखता है

चेहरे से नहीं समझता उसको किस सेे 'इश्क़ है
शख़्स बेवफ़ा हो तो कई नक़ाब रखता है

  - Bhuwan Singh

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