Meaning of

ज़ह्र

zahr • شَو

ज़हर; विष; कड़वाहट

poison; venom; bitterness

زہر; تلخی

Arabic

हो जिस के साथ मेरा अग्द ऐ मेरे मालिक
दुआ है तुझ सेे वो लड़की कनीज़-ए-ज़हरा हो

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मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में
कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में

क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में

तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा
काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में

डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझ को
भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में

सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा
तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में

फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू
बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में

सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा
दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में

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है इल्म दुनिया को ज़हरा के चैन जीत गए
अली के नस्ल के सब नूर-ए-ऐन जीत गए

मेरे नबी के नवासे ने ऐसा सज़दा किया
यज़ीद हार गया और हुसैन जीत गए

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क़ौल-ए-नबी है जो रखे ज़हरा से दुश्मनी
रू-ए-ज़मीं पे चलना भी उस का हराम है

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मेरी क़िस्मत के क्या कहने, बदन से नाग लिपटा है
ये काला नाग ज़हरीला सा, इस को इश्क़ कहते हैं

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तेरे बग़ैर भी हम ने तुझी पे शे'र कहे
रहे अँधेरे में और रौशनी पे शे'र कहे

मुझे वो धमकियाँ देती है "मार डालूँगी"
दुबारा तुम ने अगर ख़ुद-कुशी पे शे'र कहे

क़लम हमारा कभी झूठ लिख नहीं पाया
जो तीरगी थी तो फिर तीरगी पे शे'र कहे

हमारी फ़िक्र ने पानी में ज़ह्र देखा वहाँ
जहाँ पे आके सभी ने नदी पे शे'र कहे

उठाके हाथ उदासी ये बोली मैं भी हूँ
कभी जो मैं ने ख़ुशी में ख़ुशी पे शे'र कहे

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ज़हर तो पूरा का पूरा पी लिए थे आप भोले
फिर भला ये आदमी क्या खा के ज़हरीला हुआ है

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किस
में ज़हरा इतना है पैहम जो तुझ को देख ले
ये बताओ कौन आशिक़ मुझ सेे बढ़ के हो गया

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हमें क्या क्या न बोला जा रहा है
हवा में ज़ह्र घोला जा रहा है

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ज़िंदगी रोज़ डस रही है मुझे
एक ज़हरीले साँप के मानिंद

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हो जिस के साथ मेरा अग्द ऐ मेरे मालिक
दुआ है तुझ सेे वो लड़की कनीज़-ए-ज़हरा हो

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मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में
कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में

क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में

तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा
काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में

डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझ को
भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में

सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा
तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में

फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू
बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में

सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा
दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में

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ज़ह्र शब्द में खतरे और नुकसान की भावना होती है, जो अक्सर ज़हर की घातकता से जुड़ी होती है। कविता में, यह शारीरिक से परे जाकर भावनात्मक और आध्यात्मिक विषाक्तता को भी दर्शाता है, कड़वाहट और विश्वासघात के सार को पकड़ता है।

कवि अक्सर 'ज़ह्र' का उपयोग शब्दों और भावनाओं की विनाशकारी शक्ति को दर्शाने के लिए करते हैं। यह संबंधों में छिपे खतरों या अनकही नाराजगी की संक्षारक प्रकृति का प्रतीक हो सकता है।

कविता की दुनिया में, 'ज़ह्र' अदृश्य और अनकहे के लिए एक शक्तिशाली रूपक के रूप में कार्य करता है, जीवन के ताने-बाने को खोलने वाली मौन शक्तियों की याद दिलाता है।