Meaning of

मक़्ता

maqta • مقطع

अंतिम शेर; निष्कर्ष; हस्ताक्षर

final couplet; conclusion; signature

آخری شعر; نتیجہ; دستخط

Arabic

मैं हूँ तुम हो तुम हो मैं हूँ दुनिया से क्या नाता है
गीत ग़ज़ल के हर मक़्ते में नाम तुम्हारा आता है

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किताब-ए-इश्क़ में हर आह एक आयत है
पर आँसुओं को हुरूफ़‌‌‌‌-ए-मुक़त्तिआ'त समझ

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यार इक बार परिंदों को हुकूमत दे दो
ये किसी शहर को मक़्तल नहीं होने देंगे

ये जो चेहरे हैं यहाँ चाँद से चेहरे 'ताबिश'
ये मिरा इश्क़ मुकम्मल नहीं होने देंगे

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कभी उस को हम अपनी रूह का पैकर समझते थे
बहुत नादान थे मक़्तल को अपना घर समझते थे

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मक़तल-ए-शौक़ के आदाब निराले हैं बहुत
दिल भी क़ातिल को दिया करते हैं सर से पहले

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मिरी बातों को वो आधा समझती हैं
मैं मतला कहता हूँ मक़्ता समझती हैं

हुनर हैं शा'इरी मैं शे'र कहता हूँ
मगर इस को तो वो ज़ाया' समझती हैं

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कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ

ख़ुदारा मुझ को तन्हा छोड़ दीजे
मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़्तल
सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

ये आलम है, कि अपने ही लहू में
सरासर डूब जाना चाहता हूँ

सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ

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क्यूँ आ जाते हो सीधे मक़्ते पर
पहले थोड़ा काम करो मतले पर

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सू-ए-मक़्तल मियाँ सर-ब-कफ़ कौन है?
हम हैं बातिल तो हक़ की तरफ़ कौन है?

तीर अग़्यार पर नज़रें इस यार पर
अब बताओ कि उस का हदफ़ कौन है?

✍सलमान यूसुफ़

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एक वो रात थी जब मैं तन्हा मक़्तल मक़्तल घूमा था
एक ये रात कि मैं इक चारा-गर से मिलने आया हूँ

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मैं हूँ तुम हो तुम हो मैं हूँ दुनिया से क्या नाता है
गीत ग़ज़ल के हर मक़्ते में नाम तुम्हारा आता है

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किताब-ए-इश्क़ में हर आह एक आयत है
पर आँसुओं को हुरूफ़‌‌‌‌-ए-मुक़त्तिआ'त समझ

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ग़ज़ल की दुनिया में, मक़्ता एक अंतिमता और व्यक्तिगत स्पर्श का स्थान रखता है। यह कवि का हस्ताक्षर होता है, जहाँ कवि अक्सर अपना तख़ल्लुस प्रकट करता है या कोई व्यक्तिगत भावना व्यक्त करता है। यह शेर कविता को समापन और पहचान के साथ लपेटता है।

कवि मक़्ता का उपयोग एक स्थायी छाप छोड़ने के लिए करते हैं। यह अक्सर चिंतनशील होता है, कभी-कभी चंचल, और हमेशा व्यक्तिगत। मक़्ता कविता के बाकी हिस्सों के विपरीत हो सकता है या एक आश्चर्यजनक मोड़ ला सकता है।

मक़्ता वह जगह है जहाँ कवि की आवाज़ सबसे अंतरंग हो जाती है। यह दिल का हस्ताक्षर है।