maqtal-e-shauq ke aadaab niraale hain bahut | मक़तल-ए-शौक़ के आदाब निराले हैं बहुत

  - Ali Sardar Jafri

मक़तल-ए-शौक़ के आदाब निराले हैं बहुत
दिल भी क़ातिल को दिया करते हैं सर से पहले

  - Ali Sardar Jafri

Shama Shayari

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    वही है वहशत वही है नफ़रत आख़िर इस का क्या है सबब
    इंसाँ इंसाँ बहुत रटा है इंसाँ इंसाँ बनेगा कब

    वेद उपनिषद पुर्ज़े पुर्ज़े गीता क़ुरआँ वरक़ वरक़
    राम-ओ-कृष्न-ओ-गौतम-ओ-यज़्दाँ ज़ख़्म-रसीदा सब के सब

    अब तक ऐसा मिला न कोई दिल की प्यास बुझाता जो
    यूँ मय-ख़ाना-चश्म बहुत हैं बहुत हैं यूँ तो साक़ी-लब

    जिस की तेग़ है दुनिया उस की जिस की लाठी उस की भैंस
    सब क़ातिल हैं सब मक़्तूल हैं सब मज़लूम हैं ज़ालिम सब

    ख़ंजर ख़ंजर क़ातिल अबरू दिलबर हाथ मसीहा होंट
    लहू लहू है शाम-ए-तमन्ना आँसू आँसू सुब्ह-ए-तरब

    देखें दिन फिरते हैं कब तक देखें फिर कब मिलते हैं
    दिल से दिल आँखों से आँखें हाथ से हाथ और लब से लब

    ज़ख़्मी सरहद ज़ख़्मी क़ौमें ज़ख़्मी इंसाँ ज़ख़्मी मुल्क
    हर्फ़-ए-हक़ की सलीब उठाए कोई मसीह तो आए अब
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    Ali Sardar Jafri
    शाख़-ए-गुल है कि ये तलवार खिंची है यारो
    बाग़ में कैसी हवा आज चली है यारो

    कौन है ख़ौफ़-ज़दा जश्न-ए-सहर से पूछो
    रात की नब्ज़ तो अब छूट चली है यारो

    ताक के दिल से दिल-ए-शीशा-ओ-पैमाना तक
    एक इक बूँद में सौ शम्अ जली है यारो

    चूम लेना लब-ए-लालीं का है रिंदों को रवा
    रस्म ये बादा-ए-गुल-गूँ से चली है यारो

    सिर्फ़ इक ग़ुंचा से शर्मिंदा है आलम की बहार
    दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता के होंटों पे हँसी है यारो

    वो जो अंगूर के ख़ोशों में थी मानिंद-ए-नुजूम
    ढल के अब जाम में ख़ुर्शीद बनी है यारो

    बू-ए-ख़ूँ आती है मिलता है बहारों का सुराग़
    जाने किस शोख़ सितमगर की गली है यारो

    ये ज़मीं जिस से है हम ख़ाक-नशीनों का उरूज
    ये ज़मीं चाँद सितारों में घिरी है यारो

    ज़ुरअ-ए-तल्ख़ भी है जाम-गवारा भी है
    ज़िंदगी जश्न-गह-ए-बादा-कशी है यारो
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    Ali Sardar Jafri
    आँधियाँ चलती रहें अफ़्लाक थर्राते रहे
    अपना परचम हम भी तूफ़ानों में लहराते रहे

    काट कर रातों के पर्बत अस्र-ए-नौ के तेशा-ज़न
    जू-ए-शीर-ओ-चश्मा-ए-नूर-ए-सहर लाते रहे

    कारवान-ए-हिम्मत-ए-जम्हूर बढ़ता ही गया
    शहरयार-ओ-हुक्मराँ आते रहे जाते रहे

    रहबरों की भूल थी या रहबरी का मुद्दआ'
    क़ाफ़िलों को मंज़िलों के पास भटकाते रहे

    जिस क़दर बढ़ता गया ज़ालिम हवाओं का ख़रोश
    उस के काकुल और भी आरिज़ पे लहराते रहे

    फाँसियाँ उगती रहीं ज़िंदाँ उभरते ही रहे
    चंद दीवाने जुनूँ के ज़मज़मे गाते रहे
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    Ali Sardar Jafri
    इश्क़ का नग़्मा जुनूँ के साज़ पर गाते हैं हम
    अपने ग़म की आँच से पत्थर को पिघलाते हैं हम

    जाग उठते हैं तो सूली पर भी नींद आती नहीं
    वक़्त पड़ जाए तो अँगारों पे सो जाते हैं हम

    ज़िंदगी को हम से बढ़ कर कौन कर सकता है प्यार
    और अगर मरने पे आ जाएँ तो मर जाते हैं हम

    दफ़्न हो कर ख़ाक में भी दफ़्न रह सकते नहीं
    लाला-ओ-गुल बन के वीरानों पे छा जाते हैं हम

    हम कि करते हैं चमन में एहतिमाम-ए-रंग-ओ-बू
    रू-ए-गेती से नक़ाब-ए-हुस्न सरकाते हैं हम

    अक्स पड़ते ही सँवर जाते हैं चेहरे के नुक़ूश
    शाहिद-ए-हस्ती को यूँ आईना दिखलाते हैं हम

    मय-कशों को मुज़्दा सदियों के प्यासों को नवेद
    अपनी महफ़िल अपना साक़ी ले के अब आते हैं हम
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    Ali Sardar Jafri
    काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा
    रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा

    बाइस-ए-रश्क है तन्हा-रवी-ए-रह-रव-ए-शौक़
    हम-सफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंज़िल के सिवा

    हम ने दुनिया की हर इक शय से उठाया दिल को
    लेकिन एक शोख़ के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा

    तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद
    बे-गुनह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा

    जाने किस रंग से आई है गुलिस्ताँ में बहार
    कोई नग़्मा ही नहीं शोर-ए-सलासिल के सिवा
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    Ali Sardar Jafri

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