Meaning of

मंसूब

mansoob • بادہ آشامی

समर्पित; अर्पित

attributed; dedicated

منسوب; وقف

Arabic

जो मेरे नाम से मंसूब कर के तोड़े थे
वो फूल अब भी रखे हैं तेरी किताब में क्या

मुझे यूँँ वहशतों की मौत मारने वाले
बचा हुआ है मेरा अक्स तेरे ख़्वाब में क्या

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इस दुनिया का हर मंसूबा हर कोशिश बेकार हुई
इक बच्चे ने हाथ बढ़ाया चाँद को छू कर देख लिया

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पूरे कॉलेज में मेरे कोई न था उस की तरह
मुख़्तलिफ़ सब सेे हक़ीक़त में मेरी वाली थी

उस सेे मंसूब थे त्योहार सभी ख़ुशियों के
वो मेरी ईद थी दशहरा थी दीवाली थी

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जीत कर जिस को सभी कुछ पा लिया
मैं उसी की हार से मंसूब हूँ‌

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हुस्न वालों में सभी को शंग होना चाहिए
और इस के साथ ही नव-रंग होना चाहिए

अंजुमन में आएँगे तो दाद भी देंगे मगर
हर सुख़न-वर शर्त है ख़ुद-रंग होना चाहिए

मैं ज़माने में अगर मंसूब था तो तुम सेे था
क़ब्र में भी तुम को मेरे संग होना चाहिए

तीस दिन में एक दिन ही दिल पे दस्तक देते हो
इश्क़ करने का कोई तो ढंग होना चाहिए

मुझ सेे ही मंसूब है इस मुल्क की मिट्टी तो फिर
इस तिरंगे में भी मेरा अंग होना चाहिए

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बज़्म में हम तेरी कुछ यूँँ आए हैं
दश्त से जूँ लौट मजनूँ आए हैं

रब्त था मंसूब बस यारी तलक
आप फिर दिल तक मेरे क्यूँँ आए हैं

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तिरी अपनी अगर पहचान हो तो मुझ को बतला दे
तू मेरे नाम से मंसूब है सारे ज़माने में

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है नाम से मंसूब जहाँ भर में तू मेरे
जाएगा कहाँ मुझ से तू दामन को छुड़ा कर

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जो मेरे नाम से मंसूब कर के तोड़े थे
वो फूल अब भी रखे हैं तेरी किताब में क्या

मुझे यूँँ वहशतों की मौत मारने वाले
बचा हुआ है मेरा अक्स तेरे ख़्वाब में क्या

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इस दुनिया का हर मंसूबा हर कोशिश बेकार हुई
इक बच्चे ने हाथ बढ़ाया चाँद को छू कर देख लिया

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'मंसूब' शब्द में समर्पण या अर्पण की भावना होती है। कविता में, यह अक्सर किसी व्यक्ति, विचार या उद्देश्य के प्रति गहरे संबंध या जुड़ाव को दर्शाता है। इस शब्द की भावनात्मक गहराई इसके उद्देश्य और भक्ति की भावना में निहित है।

'मंसूब' का उपयोग कवि किसी प्रिय या उच्च उद्देश्य के प्रति समर्पण व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह एक आध्यात्मिक या भावनात्मक बंधन को दर्शा सकता है। यह शब्द अक्सर प्रेम, निष्ठा और विश्वास के संदर्भों में आता है।

कविता की दुनिया में, 'मंसूब' समर्पण के सार को समेटे हुए है। यह उन बंधनों की बात करता है जो साधारण से परे हैं।