Meaning of

रंज़-ओ-ग़म

ranz-o-gham • رنج و غم

दुःख और पीड़ा; दर्द और कष्ट

sorrow and grief; pain and suffering

رنج و غم; درد و تکلیف

Persian

झूठ जुमला है कि मर्दों को नहीं होता है दर्द
हर बशर की रूह को ग़म सालता तो ख़ूब है

दोस्ती कर ली हो जिसने रंज-ओ-ग़म की शाम से
दर्द ही दुश्मन है उसका दर्द ही महबूब है

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क्या हो गया है दिल को जो यूँँ चीख़ता है ये
आवाज़ रोज़ रोज़ किसे दे रहा है ये

दुनिया शराब ज़हर इसे नाम कुछ भी दे
पर हम तो जानते हैं ग़मों की दवा है ये

जाँ को मेरी क़रार भी जुज़ रंज-ओ-ग़म कहाँ
अब कोई मसअला न रहा मसअला है ये

हम से निगाह फेर के जाना हुज़ूर का
फिर शर्तिया नया कोई तर्ज़-ए-जफ़ा है ये

भागा करे उधर कि जिधर रास्ता नहीं
दिल को कहें भी क्या कि कहाँ मानता है ये

अब और छेड़िए न मेरे दिल को देखिए
पहले ही ज़ार ज़ार लहू रो चुका है ये

इक बार 'मुन्तज़िर' जो लगाया ज़बान से
फिर उम्र भर न जाएगा कैसा नशा है ये

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रंज-ओ-ग़म जिन
में मुब्तला था दिल
उन की तफ़्तीश कर रहा हूँ मैं

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मेरे ज़ख़्मों को अब मरहम मिले हैं
मिले हैं यार लेकिन कम मिले हैं

शजर क्या क्या मिला है आशिक़ी में
फ़रेब-ओ-ज़ख़्म रंज-ओ-ग़म मिले हैं

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हौसला गर हो टूट जाने का
तब कहीं जा के दिल लगाने का

ज़िंदगी रंज-ओ-ग़म का दरिया है
इश्क़ है नाम डूब जाने का

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सब रंज ओ ग़म भी गुम थे जब मिरे साथ तुम थे
वो दौर था हमारा कितना हँसी ख़ुशी का

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माथे पर न शिकन दिख जाए, होंठों को सी जाते हैं
हम हँसते-हँसते ही सारे रंज-ओ-ग़म पी जाते हैं

कुछ कुछ पानी के क़तरे सी फ़ितरत पाली है हम ने
गर हाथों से फिसले तो फिर यार फिसल ही जाते हैं

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ग़ालिब के रंज-ओ-ग़म देख के माना हम उन से अच्छे
उन को पढ़ के समझे क्या है दिया उस सूरज के आगे

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तेरे बा'द अब हम दरख़्तों से भी बदले लेंगे
परिंदे उड़ा कर के पेड़ो की तस्वीरे लेंगे

ख़ुदा के बनाए हुए है ये रंज-ओ-ग़म-ए-दिल
ख़ुदा जब भी चाहेगा ख़ुद अपने ये रस्ते लेंगे

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मुझ को अज़ीज़ ऐसे हैं दुनिया के रंज-ओ-ग़म
जैसे किसी फ़क़ीर को कासा अज़ीज़ हो

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झूठ जुमला है कि मर्दों को नहीं होता है दर्द
हर बशर की रूह को ग़म सालता तो ख़ूब है

दोस्ती कर ली हो जिसने रंज-ओ-ग़म की शाम से
दर्द ही दुश्मन है उसका दर्द ही महबूब है

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क्या हो गया है दिल को जो यूँँ चीख़ता है ये
आवाज़ रोज़ रोज़ किसे दे रहा है ये

दुनिया शराब ज़हर इसे नाम कुछ भी दे
पर हम तो जानते हैं ग़मों की दवा है ये

जाँ को मेरी क़रार भी जुज़ रंज-ओ-ग़म कहाँ
अब कोई मसअला न रहा मसअला है ये

हम से निगाह फेर के जाना हुज़ूर का
फिर शर्तिया नया कोई तर्ज़-ए-जफ़ा है ये

भागा करे उधर कि जिधर रास्ता नहीं
दिल को कहें भी क्या कि कहाँ मानता है ये

अब और छेड़िए न मेरे दिल को देखिए
पहले ही ज़ार ज़ार लहू रो चुका है ये

इक बार 'मुन्तज़िर' जो लगाया ज़बान से
फिर उम्र भर न जाएगा कैसा नशा है ये

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'रंज़-ओ-ग़म' वाक्यांश मानव दुःख और पीड़ा की गहरी गहराई को समेटे हुए है। कविता में, यह दिल की गहरी पीड़ा और हानि के सार्वभौमिक अनुभव को व्यक्त करने का माध्यम बन जाता है।

कवि 'रंज़-ओ-ग़म' का उपयोग उदासी और अस्तित्वगत निराशा के विषयों में गहराई से जाने के लिए करते हैं। यह अक्सर क्षणिक खुशी के क्षणों के विपरीत होता है, जो मानव अनुभव की द्वैतता को उजागर करता है।

कविता में, 'रंज़-ओ-ग़म' आत्मा की मौन विलापों को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण बन जाता है।