
माथे पर न शिकन दिख जाए, होंठों को सी जाते हैं
हम हँसते-हँसते ही सारे रंज-ओ-ग़म पी जाते हैं
कुछ कुछ पानी के क़तरे सी फ़ितरत पाली है हम ने
गर हाथों से फिसले तो फिर यार फिसल ही जाते हैं
— Sandeep dabral 'sendy'
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