क्या हो गया है दिल को जो यूँँ चीख़ता है ये

आवाज़ रोज़ रोज़ किसे दे रहा है ये

दुनिया शराब ज़हर इसे नाम कुछ भी दे
पर हम तो जानते हैं ग़मों की दवा है ये

जाँ को मेरी क़रार भी जुज़ रंज-ओ-ग़म कहाँ
अब कोई मसअला न रहा मसअला है ये

हम से निगाह फेर के जाना हुज़ूर का
फिर शर्तिया नया कोई तर्ज़-ए-जफ़ा है ये

भागा करे उधर कि जिधर रास्ता नहीं
दिल को कहें भी क्या कि कहाँ मानता है ये

अब और छेड़िए न मेरे दिल को देखिए
पहले ही ज़ार ज़ार लहू रो चुका है ये

इक बार 'मुन्तज़िर' जो लगाया ज़बान से
फिर उम्र भर न जाएगा कैसा नशा है ये

— Vinamra Singh

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