ज़माने को जाना तो इतना ही जाना

यहाँ हर कोई है किसी का निशाना

बताया जहाँ ने तो बस ये बताया
यहाँ से न आना वहाँ को न जाना

मुझे ऐसे नामों से दुनिया पुकारे
नशाबाज़ मदमस्त पागल दिवाना

हमें फ़र्क़ करना भी आता नहीं है
हक़ीक़त है क्या और क्या है फ़साना

जो तुम पर भी हम ने किया है भरोसा
भरोसे का तुम भी गला मत दबाना

मैं ख़ून-ए-जिगर को सियाही बना लूँ
मुझे क्या सिखाते हो लिखना लिखाना

ज़माने में तो 'मुन्तज़िर' मिल न पाया
कहीं और होगा मेरा आशियाना

— Vinamra Singh

More by Vinamra Singh

Other ghazal from the same pen

See all from Vinamra Singh →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling