लफ़्ज़ों से सनम की कोई तस्वीर बना दे
राँझा कहे ग़ज़लें तो उन्हें हीर बना दे
आशिक़ का मोहब्बत भी अजब हाल करे है
ग़ालिब में बदल दे तो कभी मीर बना दे
तारीख़ ने देखा है कि किस तरह सियासत
जन्नत में भी घुस जाए तो कश्मीर बना दे
शाइ'र को कभी भी न समझिएगा निहत्ता
अल्फ़ाज़ जो पिघलाए तो शमशीर बना दे
ख़ुशियों की कथा कोई न इस दिल को सुकूँ दे
सुन मेरी कहानी को तू दिलगीर बना दे
— Vinamra Singh















