तीरगी ग़ज़ब की है आफ़ताब आने दो

अब तो मेरे सीने में इन्क़िलाब आने दो

एक बार जी भर के देख लें तुम्हें जानाँ
उस के बा'द आता हो जो अज़ाब आने दो

इख़्तियार होता तो रोकते मगर अब तो
आँख में नमी सुर्ख़ी ख़्वाब वाब आने दो

ख़ाक हो गया क्या कुछ ज़ौक़-ए-ख़ाकसारी में
राह-ए-ज़िन्दगी में अब पेच-ओ-ताब आने दो

मुद्दतों से ज़ुल्मत की वहशतों से लड़ता हूँ
उस को मेरे हुजरे में बे-नक़ाब आने दो

यूँ सवाल करने का फ़ाएदा नहीं कोई
दूसरी तरफ़ से भी कुछ जवाब आने दो

— Vinamra Singh

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