Meaning of

शुआ

shua • شعا

किरण; प्रकाश; झलक

ray; beam; glimmer

کرن; روشنی; جھلک

Arabic

न हों अश'आर में माअनी न सही
ख़ुद कलामी का ज़रिया ही सही

तुम न नवाज़ो शे'र को, न सुनाएंगे
ये मेरा ज़ाती नज़रिया ही सही

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अमीर इमाम के अश'आर अपनी पलकों पर
तमाम हिज्र के मारे उठाए फिरते हैं

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लबों में आ के क़ुल्फ़ी हो गए अश'आर सर्दी में
ग़ज़ल कहना भी अब तो हो गया दुश्वार सर्दी में

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अश'आर मिरे यूँँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शे'र फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

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मेरे अश'आर पढ़ने वाले लोग
तेरी तस्वीर माँग बैठे हैं

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सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
जैसे कई अश'आर मुकम्मल नहीं होते

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इस लिए नहीं रोया अश'आर में
वज़्न से बाहर थी मेरी सिसकियाँ

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ग़म में हम सूरत-ए-गमख़ार नहीं पढ़ते हैं
इस लिए मीर के अश'आर नहीं पढ़ते हैं

मेरी आँखें तेरी तस्वीर से जा लगती हैं
सुब्ह उठकर सभी अख़बार नहीं पढ़ते हैं

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उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो
उस दर्द पे ला'नत की जो अश'आर में आ जाए

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शब-ए-फ़िराक़ में अश'आर आशकार हुए
मुझे नहीं है सनम तुझ सेे अब गिला कोई

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न हों अश'आर में माअनी न सही
ख़ुद कलामी का ज़रिया ही सही

तुम न नवाज़ो शे'र को, न सुनाएंगे
ये मेरा ज़ाती नज़रिया ही सही

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अमीर इमाम के अश'आर अपनी पलकों पर
तमाम हिज्र के मारे उठाए फिरते हैं

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'शुआ' का मूल अर्थ है प्रकाश की किरण, जो अंधकार को चीरती है। कविता में यह आशा, ज्ञान और क्षणिक सुंदरता का प्रतीक बन जाती है।

कवि अक्सर 'शुआ' का उपयोग सुबह की पहली किरण, तूफान के बाद की पहली रोशनी, या प्रेम और प्रेरणा की हल्की चमक को दर्शाने के लिए करते हैं। यह छायाओं और अंधकार के विपरीत, स्पष्टता और प्रकाशन के क्षणों को उजागर करता है।

कविता की दुनिया में, 'शुआ' उस प्रकाश की कोमल याद दिलाती है, जो सबसे गहरे सायों में भी बना रहता है।