चश्म-ए-हैरत को त’अल्लुक़ की फ़ज़ा तक ले गया

  - Fasih Akmal

चश्म-ए-हैरत को त’अल्लुक़ की फ़ज़ा तक ले गया
कोई ख़्वाबों से मुझे दश्त-ए-बला तक ले गया

टूटती परछाइयों के शहर में तन्हा हूँ अब
हादसों का सिलसिला ग़म-आश्ना तक ले गया

धूप दीवारों पे चढ़ कर देखती ही रह गई
कौन सूरज को अँधेरों की गुफा तक ले गया

'उम्र भर मिलने नहीं देती हैं अब तो रंजिशें
वक़्त हम से रूठ जाने की अदा तक ले गया

इस क़दर गहरी उदासी का सबब खुलता नहीं
जैसे होंटों से कोई हर्फ़-ए-दु'आ तक ले गया

जाने किस उम्मीद पर इक आरज़ू का सिलसिला
मुझ से पैहम दूर होती इक सदा तक ले गया

ख़ाक में मिलते हुए बर्ग-ए-ख़िज़ाँ से पूछिए
कौन शाख़ों से उसे ऊँची हवा तक ले गया

  - Fasih Akmal

More by Fasih Akmal

As you were reading Shayari by Fasih Akmal

Similar Writers

our suggestion based on Fasih Akmal

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari