ख़याल आपका कल मुझको इस क़दर आया
सियाह रात में जलता दिया नज़र आया
मैं इक नदी से मुलाक़ात की तमन्ना में
कई समुंदरों को दरकिनार कर आया
फ़रेब दे गया इस सादगी से वो मुझको
कि जुर्म सारा ही मजबूरियों के सर आया
कोई तो पूछे मोहब्बत के इन फ़रिश्तों से
वफ़ा का शौक़ ये बिस्तर पे क्यूँ उतर आया
As you were reading Shayari by Harsh saxena
our suggestion based on Harsh saxena
As you were reading undefined Shayari