इस ज़िंदगानी की ग़ज़ल का क़ाफ़िया सा लगता हैउस के बिना तो जैसे पूरा घर बुझा सा लगता हैयूँ तो कोई मंदिर नहीं दुनिया में उस के नाम कालेकिन न जाने क्यूँ मुझे वो देवता सा लगता है— Harsh saxena