जो भी होना था हुआ बिल-आख़िर

क्यूँ किसी से हो गिला बिल-आख़िर

ख़ुद-पसंदी का भरम टूट गया
सब समझते हैं बुरा बिल-आख़िर

ग़म-गुसारी से था परहेज़ मुझे
अब अकेला हूँ पड़ा बिल-आख़िर

आँधियों में जो टिका था अब तक
बिन हवाओं के उड़ा बिल-आख़िर

वक़्त से ज़र तो बनाया लेकिन
वक़्त सौदा न बना बिल-आख़िर

किस के दामन में इसे गिरना है
अश्क ढूँढ़े है पता बिल-आख़िर

— Javed Aslam

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