Javed Aslam

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@jaslamkhan

Javed Aslam shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Javed Aslam's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

उम्र भर कौन साथ चलता है हम-सफ़र हम ही ख़ुद हमारे हैं — Javed Aslam
उसी से प्यार है जिस से हमें नाराज़गी भी है जहाँ पर बैर होता है वहीं वाबस्तगी भी है — Javed Aslam
सहरस दो-पहर फिर सेह-पहर तब शाम-ओ-शब होना ये रफ़्तारों की दुनिया में छिपी आहिस्तगी भी है — Javed Aslam
ख़यालों में भटकना फिर दोराहे पर सँभल जाना यही है आशिक़ी मेरी यही आवारगी भी है — Javed Aslam
ढूँढ़ लूँगा नज़र उठा तो सही प्यार दिल में तिरे छुपा होगा — Javed Aslam
ज़िंदगी ने जो दिखाया है वही क्या कम था आलम-ए-हश्र का मंज़र भी अभी बाक़ी है — Javed Aslam
दर्स देने चले वफ़ा की वो जो सनद-याफ़्ता जफ़ा-गर हैं — Javed Aslam
चाँद दर्पण में उतारा कि उसे छू पाऊँ फ़ासलों में न कमी हो सकी रत्ती भर भी — Javed Aslam
वो मुहब्बत के इवज़ जान भी दे देते हैं रस्म सदियों से यही आम है परवानों में — Javed Aslam
वो रास्ते भी आज कई मंज़िला हुए मेरा जो रास्ता था ज़मीं पर नहीं रहा — Javed Aslam
अजब है इम्तिहान-ए-ज़िंदगी 'असलम' जहाँ में इसी पर्चे में हल भी है इसी में मसअला है — Javed Aslam
मुझे तन्हाई ने कानों में चुपके से कहा है मिरी आग़ोश में आजा कि तू बंदा भला है — Javed Aslam
हक़ीक़त और तमन्ना में सदा टकराव होता है हमें मालूम है 'असलम' मगर दीवानगी भी है — Javed Aslam
वो आमादा है रिश्ता तोड़ देने पर चलो झूठी दलीलें मान लेते हैं — Javed Aslam
गुज़र जाएँगे ये लम्हे बहर-सूरत बहर-क़ीमत यही है ख़ुश-गुमानी भी यही अफ़सुर्दगी भी है — Javed Aslam
ठोकरें खाते हुए इक दरिया जा समुंदर में गिरा बिल-आख़िर — Javed Aslam
टूटना ही है जान कर भी ये फूल क्यूँँ बार बार खिलता है — Javed Aslam
हैं जो आईन मुहब्बत के मुख़ालिफ़ 'असलम' पास होते नहीं दिल वालों के एवानों में — Javed Aslam
मुद्दआ' था जो हक़ीक़ी कि इता'अत करते उम्र लेकिन मिरी सारी कटी गुन-गानों में — Javed Aslam
और कुछ देर वो रुक जाते तो मैं कह सकता दिल की जो बात दबी रह गई अरमानों में — Javed Aslam

Ghazal

तू जो चाहे तेरी नज़रों से गिरा दे मुझ को तेरे बस में नहीं के दिल से भुला दे मुझ को लड़ के तूफ़ाँ से उतर तो गया हूँ साहिल पर अब किधर जाऊँ कोई ये तो बता दे मुझ को हँस चुका ख़ूब यहाँ वहम-ओ-गुमाँ में रह कर ज़िंदगी खोल दे अब राज़, रुला दे मुझ को है ख़ता मेरी मोहब्बत पे यक़ीं रखता हूँ अब तेरी मर्ज़ी है जो चाहे सज़ा दे मुझ को मेरा तो हक़ है मेरे दिल पे जिसे भी रख लूँ तेरा है फ़ैसला गर दिल से हटा दे मुझ को ख़ुश हूँ ख़्वाबों में ही ता'बीर ज़रूरी क्यूँ है डर है ऐ दोस्त कहीं तू न जगा दे मुझ को एक अरसे से तुझे ढूँढ़ रहा हूँ 'असलम' ज़िंदगी आ अभी, मुझ से ही मिला दे मुझ को — Javed Aslam
ख़मोशी से कुदूरत और भी गंभीर होती है करो बातें कि बातों में छुपी तदबीर होती है ब-ज़ाहिर लाख गर्द आलूद कर दे वक़्त की आंँधी नुमायाँ दस्तरस दिल में तिरी तस्वीर होती है ख़ुदा की थी ख़ुदा की है ख़ुदा की ही रहे गी ये जो रखवाले थे उन की कब यहाँ जागीर होती है ह़सद की आग में हर वक़्त ह़ासिद ख़ुद ही जलता है इमारत पर इमारत ख़ूब तर ता'मीर होती है जो नस्लें इल्म की दौलत से हों महरूम उन के तो गले में तौक़ पैरों में पड़ी ज़न्जीर होती है लगाना ज़र्ब जब दिल पर तो ज़ालिम याद ये रखना इसी दिल में तुम्हारी ज़ात की तौक़ीर होती है नहीं डर है तुझे दुनिया से 'असलम' जान ले दुनिया तिरे दिल में ख़ुदा के ख़ौफ़ की तन्वीर होती है — Javed Aslam
लब ख़ुश्क़ हैं अगरचे प्यासा नहीं हूँ मैं उन की इनायतों का भूखा नहीं हूँ मैं सरगोशियां चली हैं दिल और दिमाग़ में तन्हाईयाँ अपनी ही हैं तन्हा नहीं हूँ मैं उगलेगा बीज फिर से शाख़ें उलूम की ज़ेर-ए-ज़मीं हूँ माना पसपा नहीं हूँ मैं मदहोश कर दिया है नज़रों ने आप की दुनिया समझ रही थी पीता नहीं हूँ मैं अश्कों भरा समुंदर जिस सिम्त देखिए ज़िंदा तो हूँ यहाँ पर जीता नहीं हूँ मैं सहरा की वुसअतों में चाहत है बोस्तां की हल्की ग़ुनीदगी है ठेहरा नहीं हूँ मैं 'असलम' तेरी दुआएँ क्यूँ ना क़ुबूल हों हूँ हमकलाम रब से मूसा नहीं हूँ मैं — Javed Aslam