लब ख़ुश्क़ हैं अगरचे प्यासा नहीं हूँ मैं

उन की इनायतों का भूखा नहीं हूँ मैं

सरगोशियां चली हैं दिल और दिमाग़ में
तन्हाईयाँ अपनी ही हैं तन्हा नहीं हूँ मैं

उगलेगा बीज फिर से शाख़ें उलूम की
ज़ेर-ए-ज़मीं हूँ माना पसपा नहीं हूँ मैं

मदहोश कर दिया है नज़रों ने आप की
दुनिया समझ रही थी पीता नहीं हूँ मैं

अश्कों भरा समुंदर जिस सिम्त देखिए
ज़िंदा तो हूँ यहाँ पर जीता नहीं हूँ मैं

सहरा की वुसअतों में चाहत है बोस्तां की
हल्की ग़ुनीदगी है ठेहरा नहीं हूँ मैं

'असलम' तेरी दुआएँ क्यूँ ना क़ुबूल हों
हूँ हमकलाम रब से मूसा नहीं हूँ मैं

— Javed Aslam

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