beech bhanwar se kashti kaise bach nikli | बीच भँवर से कश्ती कैसे बच निकली

  - Madan Mohan Danish

बीच भँवर से कश्ती कैसे बच निकली
बहुत दिनों तक दरिया भी हैरान रहा

  - Madan Mohan Danish

Dariya Shayari

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    मुतअस्सिर हैं यहाँ सब लोग जाने क्या समझते हैं
    नहीं जो यार शबनम भी उसे दरिया समझते हैं

    हक़ीक़त सारी तेरी मैं बता तो दूँ सर-ए-महफ़िल
    मगर ये लोग सारे जो तुझे अच्छा समझते हैं
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    Nirvesh Navodayan
    बातचीत में आला हो बस ठीक न हो
    फ़ायदा क्या महबूब अगर बारीक न हो

    हम तेरी क़ुर्बत में अक्सर सोचते हैं
    दरिया खेत के इतना भी नज़दीक न हो
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    Khurram Afaq
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    पुरानी कश्ती को पार लेकर फ़क़त हमारा हुनर गया है
    नए खेवइये कहीं न समझें नदी का पानी उतर गया है
    Uday Pratap Singh
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    आँसू आँसू जिस ने दरिया पार किए
    क़तरा क़तरा आब में उलझा बैठा है
    Mashkoor Husain Yaad
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    मुहब्बत आपसे करना कभी आसाँ नहीं था पर
    बिना कश्ती के दरिया पार करना शौक़ है मेरा
    Tanoj Dadhich
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    ज़रा पाने की चाहत में बहुत कुछ छूट जाता है
    नदी का साथ देता हूँ समंदर रूठ जाता है
    Aalok Shrivastav
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    एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
    आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख
    Dushyant Kumar
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    उतरी हुई नदी को समंदर कहेगा कौन
    सत्तर अगर हैं आप बहत्तर कहेगा कौन

    पपलू से उनकी बीवी ने कल रात कह दिया
    मैं देखती हूँ आपको शौहर कहेगा कौन
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    Paplu Lucknawi
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    इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
    दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
    Mirza Ghalib
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    मैं एक ठहरा हुआ पुल, तू बहता दरिया है
    तुझे मिलूँगा तो फिर टूट कर मिलूँगा मै
    Subhan Asad
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    मैं जो भी उल्टा-सीधा सोचता हूँ
    कहीं ऐसा न हो सुनता हो कोई
    Madan Mohan Danish
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    ये माना उस तरफ़ रस्ता न जाए
    मगर फिर भी मुझे रोका न जाए

    बदल सकती है रुख़ तस्वीर अपना
    कुछ इतने ग़ौर से देखा न जाए

    उलझने के लिए सौ उलझनें हैं
    बस अपने आप से उलझा न जाए

    इरादा वापसी का हो अगर तो
    बहुत गहराई में उतरा न जाए

    हमारी अर्ज़ बस इतनी है 'दानिश'
    उदासी का सबब पूछा न जाए
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    Madan Mohan Danish
    दर्द सीने में छुपाए रक्खा
    हमने माहौल बनाए रक्खा

    मौत आई थी कई दिन पहले
    उसको बातों में लगाए रक्खा

    दश्त में आई बला टलने तक
    शोर चिड़ियों ने मचाए रक्खा

    वरना तारों को शिकायत होती
    हमने हर ज़ख़्म छुपाए रक्खा

    काम दुश्वार था फिर भी दानिश
    ख़ुद को आसान बनाए रक्खा
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    Madan Mohan Danish
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    ये नादानी नहीं तो क्या है 'दानिश'
    समझना था जिसे समझा रहा हूँ
    Madan Mohan Danish
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    आधी आग और आधा पानी हम दोनों
    जलती-बुझती एक कहानी हम दोनों

    मंदिर मस्जिद गिरिजा-घर और गुरुद्वारा
    लफ़्ज़ कई हैं एक मआ'नी हम दोनों

    रूप बदल कर नाम बदल कर आते हैं
    फ़ानी हो कर भी ला-फ़ानी हम दोनों

    ज्ञानी ध्यानी चतुर सियानी दुनिया में
    जीते हैं अपनी नादानी हम दोनों

    आधा आधा बाँट के जीते रहते हैं
    रौनक़ हो या हो वीरानी हम दोनों

    नज़र लगे ना अपनी जगमग दुनिया को
    करते रहते हैं निगरानी हम दोनों

    ख़्वाबों का इक नगर बसा लेते हैं रोज़
    और बन जाते हैं सैलानी हम दोनों

    तू सावन की शोख़ घटा में प्यासा बन
    चल करते हैं कुछ मन-मानी हम दोनों

    इक-दूजे को रोज़ सुनाते हैं 'दानिश'
    अपनी अपनी राम-कहानी हम दोनों
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    Madan Mohan Danish
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