दे के ख़ुशबू ये बिखर जाता है
फूल महबूब पे मर जाता है
दर्द जब हद से गुज़र जाता है
जान जाते ही ठहर जाता है
वस्ल हो या हो जुदाई का ग़म
चढ़ता दरया है उतर जाता है
ख़ू कोई आँधियों का हो जाए
तो किनारों से वो डर जाता है
ज़िन्दगी खेल मवाक़े' का है
जो नहीं खेलता घर जाता है
मुंसिफ़ी वक़्त से सीखो 'असलम'
हो ये कैसा भी गुज़र जाता है
— Javed Aslam















