ये दुनिया से कब कोई क्या ले गया
अमल ख़ुद का, सब की दु'आ ले गया
हुआ ख़ुश बहुत पा के साहिल मगर
जवानी को तूफ़ां उड़ा ले गया
दबे पाँव आया फ़रिश्ता यहाँ
क़फ़स से परिन्दा छुड़ा ले गया
जो बैठा हूँ तन्हाई के साथ मैं
न जाने मुझे दिल कुजा ले गया
हुनर उस का ये भी कोई कम न था
कि ज़ख़्मों को अपने छिपा ले गया
था वीरां मेरा दिल उसे क्या पता
ख़ज़ाना समझ कर चुरा ले गया
बिखर के पड़ा था तू 'असलम' यहाँ
जिसे जो मिला वो उठा ले गया
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