रूहें तन्हा कहाँ निकलती हैं
हसरतें साथ इन के चलती हैं
आहटें सोने ही नहीं देतीं
यादें छत पर मेरी टहलती हैं
तुम चले आओ भी तो क्या होगा
मुझ से ख़ुशियाँ कहाँ सँभलती हैं
हक़ पर बातिल की जीत होती है
नफ़रतें प्यार को कुचलती हैं
फ़ानी दुनिया में फल नहीं मिलता
नेकियाँ जन्नतों में फलती हैं
— Javed Aslam















