टूटे रिश्तों से फ़क़त मेरा ख़सारा न हुआ

तुम हमारे न हुए मैं भी तुम्हारा न हुआ

कौन सा शख़्स है जिस की न कटी दुनिया में
कोई ज़ीरुह नहीं जिस का गुज़ारा न हुआ

तुम ने साहिल पे मुझे ला के किया है रुसवा
ये सहारा तो मेरी जान सहारा न हुआ

रोक ले कर्मों को जाने से तेरे संग वहाँ
ऐसी तुर्बत न हुई ऐसा शरारा न हुआ

मुंतज़िर हों जहाँ ख़ल्वत की हवाएँ असलम
वो तो तूफ़ान हुआ कोई किनारा न हुआ

— Javed Aslam

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