घर में आग लगाने वाले

झूठा प्यार जताने वाले

शर्म नहीं आती है तुझ को
मेरे हक़ को खाने वाले

गिरगिट जैसे रंग बदलते
लहजा तौर सिखाने वाले

काम भला तू क्यूँ करता है
मुझ से गाली खाने वाले

तलवे नईं चाटा करते हैं
ख़ुदस नाम कमाने वाले

अपनी आँखें नीचे रखले
मुझ से आँख मिलाने वाले

ग़म का तुझ को ज्ञान नहीं है
झूठा दर्द दिखाने वाले

मुझ से लड़ने से पहले तू
तेवर देख पुराने वाले

जा पहले इंसान तो बन ले
ख़ुद को ख़ुदा बताने वाले

अब अपनी औक़ात में रहना
मेरा मुँह खुलवाने वाले

— Jitendra "jeet"

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