ham nahin the tere dushmanon men | हम नहीं थे तेरे दुश्मनों में

  - Jitendra "jeet"

हम नहीं थे तेरे दुश्मनों में
तूने समझा नहीं दोस्तों में

वो जो महफ़िल में तन्हा नहीं था
कैसे रोता है तन्हाइयों में

रक्स करता है धड़कन में ऐसे
इक तवायफ़ करे घुँघरुओं में

ख़ुदकुशी भी नहीं कर सके वो
जो बंधे हैं कई बंधनों में

जिसने थोपे हुए को न माना
उसकी गिनती हुई सरफिरों में

कितनो हिस्सों में मैं बँट गया हूँ
टूटकर देखा है आइनों में

आज उनको ज़रूरत मेरी जो
गिन रहे थे मुझे पागलों में

दर्द को मेरे कैसे समझता
वो जो बैठा नहीं शायरों में

  - Jitendra "jeet"

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