प्यार निभाना मुश्किल था मँहगाई में
सो हमने दिन काटे हैं रुसवाई में
तुम से बिछड़े तब जाकर हम ये समझे
कितना कुछ लग जाता है तन्हाई में
यार मेरे ज़ख़्मों के टाँके मत खोलो
हमने कितना दर्द सहा तुरपाई में
और भला अब किस सेे हम उम्मीद करें
हम ख़ुद काले दिखते हैं परछाई में
मजनूँ की आँखों में बस लाचारी है
लैला कंगन मांगे मुँह दिखलाई में
डोली लेने आया है इक़ शहज़ादा
इक़ मुफलिस की चीख दबी शहनाई में
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