दुश्मनों के ही अब सहारे हैं
जंग अपनों से ऐसी हारे हैं
मुझको अच्छे बुरे का इल्म नहीं
ये जो मौजूद हैं पियारे हैं
शक्ल-ओ-सूरत न तुम मिरी देखो
हम तो जैसे भी हैं तुम्हारे हैं
वसवसे दिल में अब मिरे उठते
क्या रक़ीबों के वारे न्यारे हैं
नज़रें उसकी हैं मानो हुस्न-ए-नज़र
बाँहें बाँहें नहीं इदारे हैं
मेरे नज़दीक और नहीं कोई
मसलन उसके ही सब नज़ारे हैं
एक मुद्दत से मुद्दई है जून
पाँव तशवीश ने पसारे हैं
Read Full