हर किसी से हम अपनी दास्ताँ नहीं कहते
लोग हैं जहाँ, कुछ भी हम वहाँ नहीं कहते
‛दादी माँ’ हमेशा रो के पुकारते हैं हम
आप ही उधर से इक बार ‛हाँ ’ नहीं कहते
पाँव छू तो लेते हैं हम बहुत से लोगों के
दादी कहते हैं लेकिन ‛दादी माँ’ नहीं कहते
आप जो गए, आवाज़ें चली गईं, घर अब
क़ब्रगाह है, इसको आशियाँ नहीं कहते
हम तो खूब रोएँगे आपसे मिलेंगे तो
‛किंशु’ की वफ़ा को यूँँ राएगाँ नहीं कहते
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